ग़ाज़ीपुर। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के इतिहास विभाग ने अपने स्नातकोत्तर (एम.ए.) पाठ्यक्रम में मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब के शासनकाल के प्रमुख जागीरदार कुँअर नवल सिंह सिकरवार उर्फ़ मुहम्मद दीनदार ख़ान के योगदान को सम्मिलित किया है। इसी क्रम में एम.ए. परीक्षा में प्रश्न पूछा गया— “औरंगज़ेब कालीन जागीरदार कुँअर नवल सिंह उर्फ़ दीनदार ख़ान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।” इसे मध्यकालीन भारतीय इतिहास को अधिक व्यापक, संतुलित और तथ्यपरक दृष्टि से समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल माना जा रहा है। कुँअर नवल सिंह सिकरवार मुग़ल प्रशासन के अंतर्गत औरंगज़ेब काल के एक प्रभावशाली जागीरदार थे। वे वर्तमान उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जनपद स्थित परगना ज़मानियां के जागीरदार तथा दीनदारनगर (वर्तमान दिलदारनगर) के संस्थापक माने जाते हैं। उनका जन्म बिहार के भभुआ (कैमूर) जनपद के मोहनियां थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम समहुता में हुआ था। उनके पिता कुँअर लक्षराम सिंह तथा दादा कुँअर खर सिंह थे। वे क्षत्रिय राजपूत समाज के सिकरवार वंश से संबंधित थे। इस्लाम धर्म ग्रहण करने के उपरांत वे मुहम्मद दीनदार ख़ान के नाम से विख्यात हुए। अपने समय में दीनदार ख़ान ने मुग़ल जागीर व्यवस्था के संचालन, राजस्व संग्रह तथा स्थानीय शांति एवं प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे हिंदू–मुस्लिम साझा संस्कृति के प्रतिनिधि व्यक्तित्व माने जाते हैं—जन्म से हिंदू, धर्म परिवर्तन के पश्चात मुस्लिम और कर्म से मानवता के पक्षधर। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में फैले उनके हिंदू-मुस्लिम वंशज आज भी उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर गर्व करते हैं। उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जनपद के कमसार क्षेत्र तथा बिहार के परगना चैनपुर तक विस्तृत था। उनके भाई दानिश ख़ान को सम्राट औरंगज़ेब द्वारा दत्तक पुत्र का दर्जा प्राप्त था। वहीं उनके पुत्र कुँअर धीर सिंह उर्फ़ बहरमंद ख़ान को परगना चैनपुर (बिहार) का फौजदार नियुक्त किया गया, जिनकी सन् 1710 ई. में सेवराई क्षेत्र की रक्षा करते हुए सात साथियों सहित हत्या कर दी गई थी। बीएचयू के इतिहास विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजीव श्रीवास्तव श्री गुरूजी के अनुसार, इस पाठ्यक्रम समावेशन से विद्यार्थियों को मुग़ल काल में स्थानीय जागीरदारों, क्षेत्रीय नेतृत्व और प्रशासनिक संरचना की भूमिका को समझने की नई दृष्टि मिलेगी। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि इतिहास केवल सम्राटों और केंद्रीय सत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर सक्रिय व्यक्तित्वों के योगदान से भी निर्मित होता है। जागीरदार दीनदार ख़ान के दसवीं पीढ़ी के वंशज, दिलदारनगर निवासी एवं राष्ट्रीय धरोहर संरक्षणकर्ता डॉ. कुँअर नसीम रज़ा सिकरवार ने इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह ग़ाज़ीपुर के क्षेत्रीय इतिहास के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा निर्मित ‘दीनदार ख़ान कोट’ पर उनके द्वारा स्थापित एवं संरक्षित ‘अल-दीनदार शम्सी म्यूज़ियम एंड रिसर्च सेंटर’ में परगना ज़मानियां (ग़ाज़ीपुर) एवं परगना चैनपुर (बिहार) से संबंधित सैकड़ों फ़ारसी फ़रमान, दुर्लभ दस्तावेज़, पांडुलिपियाँ और पुस्तकें संरक्षित हैं, जो शोधार्थियों और इतिहासकारों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। बीएचयू की एम.ए. छात्रा एवं शोधार्थी ज़ीनत रहमान के अनुसार, दीनदार ख़ान ने मौजा अखंधा को क्रय कर अपने नाम पर दीनदारनगर बसाया, जो आज दिलदारनगर के नाम से जाना जाता है। वहीं शोधार्थी सृष्टि त्यागी ने उनके काल में संरक्षित प्राचीन मंदिर, एवं उनके द्वारा निर्मित शाही दीनदारिया मस्जिद (ईदगाह), जल टंकी, मज़ार, घोड़े की समाधि तथा मुग़ल स्थापत्य शैली को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। बीएचयू के इतिहास पाठ्यक्रम में इस समावेशन से उत्तर प्रदेश-बिहार में फैले दीनदार ख़ान के वंशजों, इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और समाजसेवियों में प्रसन्नता का वातावरण है। इसे क्षेत्रीय इतिहास को राष्ट्रीय शैक्षणिक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम माना जा रहा है।
23 hours ago
खबर
पुलिस पर पथराव का मामला, डीआईजी ने घटनास्थल का किया निरीक्षण






